दृष्टि…

आज कई दिनों बाद मैं लिखने बैठी हूँ
कोई प्रेम कहानी लिखूँ या विरह व्यथा
इसी कशमकश में कलम लिए बैठी हूँ
कागज भी जरा उत्साहित हो बोल उठा
तुम्हारे एहसासों को आज स्याही बना
उकेर दो भावनाओं का संसार सारा
सिर्फ खुशियों की मुझ पर चादर बिछा
गम को न दिल की गहराई में यूँ छुपा

मेरी दृष्टि

जिंदगी तेरा इम्तिहान कब तक चलेगा
अध्याय कभी रूचिकर आ जाता है
कभी जिंदगी के पाठ कठिन हो जाते
कभी प्यार की बौछारों से भीग जाते
कभी उदासी की घटाओं से घिर जाते
अब मैं दुनियाँ को पढ़ते पढ़ते थक गया
न कभी खुद को ही समझ सका
चाहा क्या सोचा क्या हुआ क्या ???
आखिर किया खुद से समझौता हर बार
क्योंकि सामने खड़ी है रिश्तों की दीवार
अपनों को समझ सकता हूँ पर …
समझा नहीं सकता खुद के सिवा किसी को
इसलिए जो जैसा भी हुआ सबको मंजूर है
बस वो ही बना मेरी जिंदगी है…

नजर…

दुनिया परखने की परख हो आई
क्योंकि ठोकरें मैंने बहुत खाई है
अपनों में जो परायापन मिला
और परायों में मुझे मिले अपने है
पत्थर में मैंने रब को है पाया
और भगवान पत्थर दिल देखे हैं
अमीरों में फ़कीरी को देखा
और फटेहाल में रईसाई मिली है
झोंपड़ी में संस्कारों को देखा
और महलों में बदतमीजी पाई है
बहते आँसुओं में भी खुशी को देखा
और हँसते चेहरों में उदासी पाई है
गैरों के सुख से दुखियों को देखा
और अपनों के दुःख में सुखी पाए हैं
दुनिया परखने की परख हो आई
क्योंकि ठोकरें मैंने बहुत खाई है…

मेरी दृष्टि…

जरूरत थी साथ की तब भी वो लड़ता था
छाँव को दरकिनार कर वो निकलता था
आँखों में अपनों को बसा दौड़ वो रहा था
सपनों को सच करने वो निकल पड़ा था
संघर्ष था वो जिससे मंजिल मैं चढ़ा था

गिरता था उठता था पर कहीं ना रूका था
पैरों में लौह-पादुका सा एहसास होने लगा था
भुजबल को दुगना कर हर रोज वो उठा था
नींद को सुला रातों में जागा वो करता था
संघर्ष था वो जिससे मंजिल मैं चढ़ा था

चिलचिलाती धूप में वो नंगे पैर चला था
गिरते पाले में वो नंगे बदन बढ़ा था
तूफानों को जिसने राह में धूल चटाई थी
आँधियों पर वो हमेशा भारी पड़ा था
संघर्ष था वो जिससे मंजिल मैं चढ़ा था

आँखे खोलता तो दिखती पिता की मेहनत थी
ममता की मूरत की सूरत आँखों में छा जाती थी
बहन की भाग्यरेखा का जाल जो दिखता था
उसके कल के लिए वो मजबूत और हो जाता था
संघर्ष था वो जिससे मैं मंजिल चढ़ा था

drishti

एक प्यारा – सा सपनों का घर हो
एक प्यारा – सा अपनों का घर हो
माँ बाबा ताऊ ताई जिसमें रहते हो
घर की रौनक सी गुड़िया मैं हो
वहीं पास में छोटा सा स्कूल हो
बाबा उँगली पकड़ा के ले जाते हो
माँ बस्ता टाँगे लेने जाती हो
भाई बहनों संग दिन बीतते हों
दोस्तों की मस्ती में मस्त रहती हो
ददू के कंधें चढ़ खेत में जाती हो
दादी माँ पे प्यार पूरा लुटाती हो
जीजी से बार बार लड़ जाती हो
मासी संग ननिहाल जाती हो
नानी के घर दही बाटी खाती हो
मामी से थोड़ी झड़प हो जाती हो
नाना डीडाना-ली कह बतियाते हो
मामा जब नई सी फ़्रॉक लाते हो
नए कपड़े पहन मैं यूँ झूम उठती हो
इस जीवन में बचपन मेरा फिर से हो
जिसमें मैं हंसती नहीं खिलखिलाती हो
Miss my childhood….

Miss you so much…ददू…

रात को सोते वक्त दादाजी याद आ रहे थे। पिछले 25 दिन से घर में जो माहौल छाया हुआ था वो मेरे मस्तिष्क में किसी शिलालेख पर उकेरे अक्षरों की तरह गहराई से छपा हुआ है। मैंने मेरे बापूजी और ताऊजी की आँखों में पहली बार आँसू देखे थे। ना चाहते हुए भी सब कुछ बार बार आँखों के सामने आ रहा था क्योंकि ऐसा कुछ मेरी आँखों ने पहली बार देखा था। सोते जागते हर पल एक बार के लिए तो दादाजी याद आ ही जाते और लगता काश एक बार फिर से मिल जाए फिर से आ जाए हमारे साथ रहने को।
ये सब विचार सपने में भी आने लगे तो कल रात को मुझे लगा हम सब दादाजी के जाने के बाद 12 वें दिन बैठे हैं और दादाजी की बॉडी उसी गहरे भूरे रंग के कम्बल में लिपटी हुई रखी है और मेरी नजर उसी पर है उतने में उसमें हलचल हुई और दादाजी जैसे नींद से उठते थे वैसे ही उठ बैठे और उनकी पीठ मेरी तरफ है और देखते ही देखते पूरी सफेद बॉडी गर्दन से कमर तक बिल्कुल जीवन्त हो उठी लगा जैसे किसी सूखे शरीर में खून का संचार करवाया गया है और मैंने चिल्लाकर बापूजी से कहा देखो दादाजी तो उठ गए और पीछे से जाके उनकी पीठ से लिपट गई और फिर बापूजी से कहा आपने इतने दिन क्यों नहीं जगाया इनको और ये तो अच्छा हुआ अंतिम संस्कार नहीं किया आपने अब तक वरना मेरे दादाजी कहाँ से आते और इतने दिन कहाँ छुपाए रखा था और आगे बोले ही जा रही थी उतने में दादाजी की आवाज आई याद तो नहीं क्या कहा पर मैंने देखा तो वो सो रहे थे और जैसे भाईसाहब को देख के उनसे कुछ लाने का बोल रहे थे फिर सब उनके चारों तरफ बैठ गए और बताया कि हमनें सब रस्में अदा करी थी पर कोई कमी रह गई हो तो अब आप आ गए हो तो आप ही देख लो तो दादाजी हँसकर बोले अच्छा ही है सब कर दिया तो आराम से जीऊँगा फिर मैंने कहा आप झूठ बोल के चले गए ना दादाजी क्योंकि दादाजी 89 साल जीएंगे ये मेरे दिमाग में ऐसे बैठा था जैसे यमराज ने खुद कहा हो तो हँस के बोले झूठ बोल के कैसे जा सकता हूँ तभी तो तुझसे मिलने आ गया और फिर मुझे कुछ याद नहीं।

ये क्या था क्यों था पता नहीं पर मैं कुछ भी भूला नहीं पा रही हूँ।

मेरी दृष्टि…

आज 31 तारीख हो गई कल 1 हो जाएगी…

गई पुरानी साल वैसे ही नई भी निकल जाएगी…

जब बेटियाँ इस संसार से विलुप्त हो जाएगी…

क्या ये कुरीतियाँ तब तक शान मानी जाएगी…

पढ़ लिख कर भी माँ का हाथ ये बंटाएगी…

तुम्हारी आबरू के लिए दुनियाँ से लड़ जाएगी…

बोझ ना मानो इन्हें पिता का सहारा बन जाएगी…

अपने घर से विदा हो जब ये पिया घर जाएगी…

खुद का घरोंदा छोड़ने का दर्द भी ये सह जाएगी…

इस उपवन की कली अब माली बन जाएगी…

सास को माँ, ननद को बहन मान अपनायेगी…

पिया के घर को ही मंदिर मान यूँ सजायेगी…

मुश्किल में सारथी बन साथ ये निभायेगी…

दहेज की मांग पर कली मुरझा सी जाएगी…

पिता के अपमान को वो ना सह पाएगी…

जब बेटियाँ इस संसार से विलुप्त हो जाएगी…

क्या ये कुरीतियाँ तब तक शान मानी जाएगी…